स्वयं को दूसरों के प्रति व्यक्त करना ही अभिव्यक्ति है. सामान्यतः हम इसे प्रतिक्रियात्मक रूप में ही अपनाते हैं. जीवों द्वारा अपनाया जाने वाला यह सशक्त माध्यम हमें प्रकृति प्रदत्त है एवं दिनचर्या में हम इसका प्रयोग अनिवार्य रूप से करते हैं.
इसके दो मूल रूप हैं, भावनात्मक एवं क्रियात्मक, और ये दोनों ही एक दूसरे के पूरक हैं. बिना क्रिया के, जो केवल इन्द्रियों द्वारा ही संभव है, भावना की अभिव्यक्ति नहीं हो सकती.
अभिव्यक्ति माध्यम के सन्दर्भ में प्रमुख हैं – दृष्टि , वाणी एवं स्पर्श. जब दृष्टि का प्रयोग अनुत्तरित होता है तो वाणी सहायक होती है एवं जब यह दोनों ही माध्यम अपूर्ण अथवा असफल होते हैं तो स्पर्श अपने तृतीय स्थान पर अपनी सशक्तता के साथ पूर्ण सहायक होता है. इन माध्यमों का प्रयोग विरल अथवा सामूहिक, परिस्थितिजन्य होता है.
दृष्टि की सफलता के लिए प्रथम यह आवश्यक है कि आपकी एवं सम्मुख कि दृष्टि एकाकार हो, द्वितीय, सम्मुख के लिए आपकी अभिव्यक्ति ग्राह्य हो. यदि यह ग्राह्य है तो भी सम्मुख व्यक्ति अपनी प्रतिक्रिया देने या न देने के लिए स्वतंत्र है, यह मानकर कि वह इसे समझ नहीं पाया.
वाणी मौखिक अथवा लिखित कि सार्थकता तभी है जब यह मातृ भाषा में हो ताकि सम्मुख उसकी मूल भावना को ग्रहण करे. कारण दो हैं. प्रथम, हम स्वयं अपनी मूल भावना के लिए उचित शब्दों का प्रयोग करें, द्वितीय सम्मुख शब्दों के शब्दार्थ एवं भावार्थ में विश्लेषण हेतु समर्थ हो. भले ही आपकी भावना किसी दूसरे द्वारा उल्लिखित अथवा उदधृत पंक्तिओं से हो परन्तु उसकी अभिव्यक्ति आपकी मौलिक वाणी में होनी चाहिए तभी वह प्रभावशाली होगी अन्यथा आपका प्रयास मात्र वाहक के रूप में ही परिलछित होगा.
स्पर्श, एक संपूर्ण, सशक्त, पूर्ण मौलिक, प्रभावशाली एवं सर्व ग्राह्य माध्यम है. इसमें दृष्टि अथवा वाणी निम्नस्तर पर प्रभावी अथवा मौन रहती है. यह माध्यम आत्म निर्भर है. जीवन में इसका प्रभाव प्रथम, सदैव एवं अंततः रहता है. संसार में आगम्नोपरांत नवजात को सर्वप्रथम जननी के वात्सल्य, बालपन में किसी बड़े की उंगली द्वारा सुरक्षा, बड़े होने पर सखा द्वारा हाथ में हाथ लेकर अत्म्यीयता, शोक संतप्त अथवा हर्षित के गले लगकर भावनाभिव्यक्ति किसी अन्य माध्यम द्वारा असंभव है. यदि यह संभव होता तो समाज में व्यक्तिगत रूप से निकटता की आवश्यकता नहीं होती. भावनाओं को मूल रूप से देय अथवा ग्राह्य केवल इसी माध्यम से ही किया जा सकता है. इसमें कपट अथवा शंका शून्य होती है तभी तो पशु पछी भी स्पर्श द्वारा हमारी भावनाओं को आसानी से समझ लेते हैं.
किसी भी माध्यम द्वारा अभिव्यक्ति दो परिस्थितिओं में कि जाती है, व्यक्तिगत अथवा सामूहिक.
सामूहिक अभिव्यक्ति में हार्दिक भावना गौण एवं मूल में बुद्धि कि व्यवहारिकता प्रधान होती है. यहाँ यह जान लेना आवश्यक है कि आपकी सामूहिक अभिव्यक्ति दूसरे के हृदय के प्रवेश द्वार तक ही पहुँचती है एवं इसका प्रभाव अस्थायी होता है.
व्यक्तिगत अभिव्यक्ति एक हृदय की भावना को दूसरे ह्रदय में चिरस्थायी करना होता है. इसका प्रभाव हृदयस्पंदन के साथ ही संसार से विदा लेता है.
अभिव्यक्ति रूप अथवा प्रयोग में जैसी भी हो मौन नहीं होनी चाहिए, विशेष कर सम्मुख के प्रति. आपकी मौन अभिव्यक्ति सदैव नकारात्मक प्रतिक्रिया का ही संकेत देगी एवं सम्मुख को उद्दंड, उद्दिगन अथवा हीन भावना से ग्रसित करेगी.
जब पशु पछी भी अपनी भावनाएँ व्यक्त करते हैं तो मानव होने के नाते आप स्वयं को अवश्य अभिव्यक्त करें क्योंकि यही आपकी निजता, व्यवहारिकता, मौलिकता, संवेदनशीलता एवं चेतना का प्रमाण है.
जड़ एवं शव अवश्य ही ऐसा न करने के लिए बाध्य हैं एवं इस हेतु किसी को उनसे कोई परिवाद भी नहीं है.
नामुराद
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